Es abhav ki purti krni hi hogi
घड़ी जैसी अनेक पुर्जो वाली मशीन तभी ठीक प्रकार बन और चल पाई है ,जब उनके सभी घटको का निर्माण ठीक तरह किया गया हो ,उनकी गतविधियों के बीच संतुलन बिठाया गया हो। इस व्यवस्था के बिना उस निर्माण में लगा हुआ धन और श्रम व्यर्थ ही चला जाता है। घड़ी निकम्मी पड़ी रहती है। यही बात अन्य छोटी बड़ी मशनियो पर पूरी तरह लागू होती है। उसके निर्माता तभी अच्छा लाभ और यस कमा पाते है ,जब उनके पुर्जे सन्तुलति रीति से बने और फिट किये गए हो। सृष्टा की महिमा इसलिए भूरि -भूरि प्रशंसा के योग्य है कि उसमे व्यवस्था कर्म का आस्चर्यजनक सुनियोजन हुआ है। उसमे कमी या गड़बड़ी रहती तो अनिरंथी स्वेछाचारी ग्रहे गोलक आपस में टकराते और टूट -फूट कर नष्ट होते रहते। प्राणियों और वनस्पतियो के सबंध में भी यही बात है। वे इसलिए एक व्यवस्था के अनुरूप उगते ,बढ़ते और परिवर्धित होते रहते है। यहां तक कि खुली आँखो से न दीख पड़ने वाले अणु -परमाणु तक अपने छोटे कलेवर में विशाल सौर मंडल जैसी गतिविधियों के अनुकरण का उदहारण प्रस्तुत करते रहते है। यदि इस विशाल ब्रहांड व्यवस्था में ...