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Keya nirash hua jaye

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इस कहानी में हमने निराशा के स्थान पर सदैव आशावान रहने की प्रेरणा दी है।  मेरा मन कभी -कभी बैठ जाता है। समाचार पत्रों में ठगी ,डकैती ,चोरी ,तस्करी और भ्र्ष्टाचार भरे रहते है। आरोप -प्रत्यरोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है ,देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ही ऊंचे पद पर है ,उसमे उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते है। एक बहुत बड़े आदमी ने मुझसे एक बार कहा था कि इस समय सुखी वही है ,जो कुछ नहीं करता। जो भी कुछ करेगा उसमे लोग दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जायगे और दोषो को बढ़ा -चढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमें नहीं होते ? यही कारण है कि हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है ,गुणी कम या बिलकुल ही नहीं। सिथित अगर ऐसी है तो निश्चय ही चिंता का विषय है। किया यही भारतवर्ष है ,जिसका सपना तिलक और गाँधी ने देखा था ?                         रवीन्रनाथ नाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान संस्कृति -सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के गहवर में डूब गया ? आर्य और द्रव...