Yurop ki yatra
यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। दोस्तों की सलहा से मैने सर्दी के लिए गर्म कपड़े बनवाये। मै रोजाना खादी कपड़े ही पहने करता था। इस कहानी में डॉक्टर राजेंद्र जी की यूरोप यात्रा का जिक्र है। कपड़े की काट -छाट भी देशी रखी। अंग्रेजी कपड़े न पहनने का निश्चय किया। फलस्वरूप दो बाते हुई। बहुत कम खर्च में काम के लायक काफी कपड़े तैयार हो गए। कपड़े हिंदुस्तानी थे। इसलिए उसमे कुछ भूल अथवा भद्दापन भी हो तो कोई विदेशी समझ नहीं सकता था। अंग्रेजी कपड़े और रहन -सहन धारण करने पर उन लोगो के फैशन और रीती -निति के अनुसार ही चलना -फिरना ,कपड़ा पहनना और खाना -पीना पड़ता है। अपना रहन -सहन कायम रखने से यह सब झँझट दूर हो जाता है। खासकर मुझ जैसे आदमी के लिए यह झंझट कुछ कम नहीं है क्योकि मैने कभी जीवन में कपड़े और फैशन पर ध्यान दिया ही नहीं। मैंने कपड़ो को ही शरीर गर्म रखने और लज्जा -निवारण का साधन मात्र ही समझा है। ...