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School mujhe acha lga

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प्रस्तुत कहानी में लेखक ने वर्तमान स्कूलों की शिक्षा -पद्धति पर करारी चोट करते हुए उसे बच्चो के लिए व्यावहारिक बनाने की बात कही है।  जब तोत्तो -चान ने नये स्कूल का गेट देखा तो वह ठिठक गयी। अब तक जिस स्कूल में वह जाती रही थी उसका गेट सीमेंट के दो खम्भों का बना था और गेट पर बड़े -बड़े अक्षरों में स्कूल का नाम लिखा था ,पर इस स्कूल का गेट तो पेड़ के दो तनो का था। उन पर टहनियाँ और पत्ते भी थे।     'अरे ,यह गेट तो बढ़ रहा है ',तोत्तो -चान ने कहा। 'यह बढ़ता जायेगा ,और एक दिन शायद टेलीफोन के खम्भे से भी ऊंचा हो जायेगा। ' गेट के ये दो खम्भे असल में पेड़ ही थे ,जिनकी जड़े मौजूद थी। कुछ और पास पहुंचने पर तोत्तो -चान ने अपनी गर्दन टेढ़ी कर स्कूल का नाम पढ़ना चाहा। टहनी पर टँगी नाम की तख्ती भी हवा से टेढ़ी हो गयी थी।  'तो -मो -ए  गा -कु -एन। ' तोत्तो -चान माँ से पूछना चाहती थी कि तोमोए का मतलब क्या होता है ,तभी अचानक उसे एक चीज दिखी और उसे लगा जैसे वह सपना देख रही हो। वह बैठ गयी ताकि झाड़ियों के बीच से अच्छी तरह देख पाये। उसे अपनी आँखो पर विश्वास नहीं हो रहा था।...

Subash chnder bos ke udbodhn

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प्रस्तुत कहानी में सुभाष बाबू के टोकियो रेडियो से प्रथम प्रसारण ,आजाद हिन्द फौज के पुर्नगठन तथा आजाद हिन्द फौज की मान्यता मिलने के अवसर पर उनके द्वारा दिए गए सम्बोधन के महत्वूर्ण अंश दिए गए है।  सुभाषचंद्र बोस सच्चे देशभगत थे। उनका केवल एक ही लक्ष्य था --भारत से अंग्रेजो को निकाल बाहर करना और अपने देश वासियो की गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर स्वाधीनता का उपहार देना।       सुभाषचंद्र बोस "नेता जी "के नाम से प्रसिद्ध है। उन्होंने बर्मा ,( म्यांमार )जापान आदि देशो में रहने वाले भारतीयों को एकत्र कर ' आजाद हिन्द फौज ' की स्थापना की ,आजादी का बिगुल फूंका। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर अपने ओजस्वी भाषणों के द्वारा लोगो को प्रेरणा प्रदान की और संघर्ष करने का आह्वान किया।            21 जून सन 1943 ई० को टोकियो रेडियो से प्रथम प्रसारण - "व्यक्ति आते है और चले जाते है ,साम्राज्य बनते और बिगड़ते है। बिर्टिश साम्राज्य को सदैव के लिए जाना होगा। हमारी स्वंत्रता किसी प्रकार का भी समझौता नहीं चाहती है। हमे स्वंत्रता तब ही प्राप्त होगी ,जब ब्...

Shap aur mukti

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प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने डॉ 0 प्रभात के माध्य्म से अपराधबोद तथा प्रायश्चित -स्वरूप मानव का व्रत लेने का चित्रण किया है।  एक दिन ऐसा हुआ कि मै बूढ़ी दादी की आँखो का इलाज कराने दिल्ली के एक बड़े प्रसिद्ध नेत्र -चिकित्स्क डॉ 0 प्रभात के कमरे में पहुंचा तो उन्होंने मुस्कराते हुए दादी का स्वागत किया ,''आओ,आओ दादी अम्मा !कहाँ ,किया तकलीफ है ?' दादी ने आवाज से ही डॉक्टर की उम्र का अनुमान लगा कर कहा ,कोई ,' तकलीफ नहीं बेटा। बस बुढ़ापे की मारी हूँ। बुढ़ापे में नजर कमजोर हो ही जाती है। '       ' पर मै तो आँखो का डॉक्टर हूँ दादी अम्मा !बुढ़ापे का इलाज मेरे पास कहाँ ?' डॉ0 प्रभात ने हँसते हुए कहा। मेरी दादी भी कम विनोदी स्वभाव की नहीं। कहने लगी ,'कोई बात नहीं ,बेटा ! तुम आँखो का ही इलाज कर दो ,बुढ़ापे का इलाज तो भगवान के पास भी नहीं है। 'यह सुनकर डॉ 0 प्रभात हँस पड़े और दादी से बात करते हुए उनकी आँखो की जाँच करने लगे। उन्होंने विस्तार से ,कई उपकरणों और यंत्रो की सहायता से दादी की आँखो की जाँच की बीच -बीच में बातचीत और हंसी -मजाक भी करते जाते थे।      ...

Keya nirash hua jaye

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इस कहानी में हमने निराशा के स्थान पर सदैव आशावान रहने की प्रेरणा दी है।  मेरा मन कभी -कभी बैठ जाता है। समाचार पत्रों में ठगी ,डकैती ,चोरी ,तस्करी और भ्र्ष्टाचार भरे रहते है। आरोप -प्रत्यरोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है ,देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ही ऊंचे पद पर है ,उसमे उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते है। एक बहुत बड़े आदमी ने मुझसे एक बार कहा था कि इस समय सुखी वही है ,जो कुछ नहीं करता। जो भी कुछ करेगा उसमे लोग दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जायगे और दोषो को बढ़ा -चढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमें नहीं होते ? यही कारण है कि हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है ,गुणी कम या बिलकुल ही नहीं। सिथित अगर ऐसी है तो निश्चय ही चिंता का विषय है। किया यही भारतवर्ष है ,जिसका सपना तिलक और गाँधी ने देखा था ?                         रवीन्रनाथ नाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान संस्कृति -सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के गहवर में डूब गया ? आर्य और द्रव...

Ese bhi bhgt hai is dhrti pr .

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हमारे देश में अनेक ऐसे भगत भी है जो सब कुछ निछावर कर सकते है भगवान के नाम पर ,ऐसे ही एक भगत की घटना है इस कहानी में।   एक नर्सिंग भगत थे।  जो श्री कृष्ण के बहुत बड़े भगत थे। वे कभी बहुत बड़े राजा थे ,जो की उन्होंने अपने भगवान श्री कृष्ण के नाम पर सब कुछ त्याग दिया। उनको खाने के लिए भी खाना नहीं था। वे सब कुछ त्यागकर जंगल में एक झोपडी में रहते थे। उनकी एक लड़की थी। जिसका नाम हरनदी था। कहते है की जब मनुष्य के पास धन नहीं होता तो लोग उससे बचकर निकलते है की कही आप से वो पैसे न मांग ले। नर्सिंग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।                                  नर्सिंग की बेटी ने भी अपने पिता से मुँह मोड़ लिया था। अब नर्सिंग की बेटी की पुत्री की सादी आ गयी। अब हरनदी और ज्यादा परेशान हो गयी क्योकि उसे पता था की तेरे पिता के पास धन तो है नहीं। वह भात कैसे देगा। हरनदी के यह से एक नाई नर्सिंग भगत के गांव पहुंचा। नाई जिससे भी नर्सिंग भगत के घर का पता पूछता वही हंसी उडाता और बोलता भाई वह तो कहीं भांग पिए...

Chand ka kurta .

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यह एक प्रसिद्ध कविता है। यहाँ चाँद अपनी माँ से अपने लिए एक कुरता सिलवाने की विनती करता है।  हठ कर बैठा चाँद एक दिन , माता से यह बोला , "सिलवा  दो माँ ,मुझे उन का , मोटा एक झिंगोला ।  सन -सन चलती हवा रात भर , जाड़े से मरता हूँ , ठिठुर -ठिठुर कर किसी तरह  यात्रा पूरी करता हूँ।  आसमान का सफर और यह , मौसम है जाड़े का , न हो अगर तो ला दो कुरता  ही कोई भाड़े का। " बच्चे की सुन बात कहा  माता ने ,"अरे सलोने ! कुशल करे भगवान ,लगे मत , तुझको जादू -टोन।  जाड़े की तो बात ठीक है , पर मै तो डरती हूँ , एक नाप में कभी नहीं , तुझको देखा करती हूँ।  कभी एक अंगुल भर चौड़ा , कभी एक फुट मोटा , बड़ा किसी दिन हो जाता है , और किसी दिन छोटा।  घटता -बढ़ता रोज ,किसी दिन  ऐसा भी करता है , नहीं दिखलाई पड़ता है।  अब तू ही यह बता , नाप तेरी किस रोज लिवाय , सी दे एक झिंगोला जो , हर रोज बदन में आए ?"

keya aap ko lgta hai ki sbka malik ek hai

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दुनिया में मानव जीवन शुरू करने के लिए सृष्टि रचियता ने आदम और हवा को धरती पर भेजा है।  सेब जैसे स्वादिष्ट फल का मजा उन्होंने लिया और उसके बाद जितने भी आदमी हवा पैदा हुए उन्होंने उतपति के सिद्धांत का पीछा नहीं छोड़ा और अब हाल यह है कि पूरी दुनिया के कुछ देश तो इन दोनों के आकषर्ण के परिणामो को बुरी तरह झेल रहे है। ज्यो ज्यो जनसख्याँ बढ़ती रही इंसान ने अपने शौक व इछाओ के अनुरूप अपने -अपने समहुओ का स्थापन व विस्तार किया। कोई शक्तिशाली व्यक्ति समहू  मालिक बनता गया। कई  जमानो तक यही माना जाता रहा है कि सबका मालिक एक है        आशय नीली छतरी वाले मालिक से ही रहा होगा। लेकिन यह सोच अंदर खाते बदलती भी रही। सामाजिक व आर्थिक  बदलावों  व विकास के कारण , विश्वास के वृक्ष की शाखाएँ फैलती रही और उनमे उगी असंतुस्टी ने नए धर्म ,विश्वास व आस्थाएं पैदा की। हर आँगन से यही प्राचीन प्रवचन दोहराया गया कि सबका मालिक एक है         झिड़ी मेले में लोक नायक बाबा जित्तो की क़ुरबानी याद करने उमड़ते है भगत।  बड़े धर्मो की बैठकों में जब...